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गणेश चतुर्थी मुहूर्त


हिंदू पंचांग के अनुसार हर साल भाद्रपद के शुक्लपक्ष की चतुर्थी तिथि को गणेश चतुर्थी का त्योहार मनाया जाता है। इसी तिथि पर भगवान गणेश का जन्म हुआ था। गणेश चतुर्थी पर बुद्धि, समृद्धि और सौभाग्य के देवता भगवान गणेश की विधिवत पूजा-अर्चना की जाती है। 2 सितंबर दिन सोमवार की शुरुआत हस्त नक्षत्र में होगी और गणेश जी की स्थापना चित्रा नक्षत्र में की जाएगी। मंगल के इस नक्षत्र में चंद्रमा होने से शुभ फल की प्राप्ति होती है।जहां ग्रह-नक्षत्रों की शुभ स्थिति से शुक्ल और रवियोग के साथ सिंह राशि में चतुर्ग्रही योग भी बन रहा है। ग्रहों और सितारों की इस शुभ स्थिति के कारण इस त्योहार का महत्व और शुभता और बढ़ जाएगी। ग्रह-नक्षत्रों के इस शुभ संयोग में गणेश प्रतिमा की स्थापना करने से सुख-समृद्धि और शांति मिलेगी। गणेशोत्सव  भाद्रपद की चतुर्थी से लेकर चतुर्दशी तक 10 दिन चलता है। इस साल यह अवधि 2 सितंबर से 12 सितंबर तक रहेगी। 
गणेश जी की स्थापना का शुभ मुहूर्त:-
गणेश चतुर्थी के दिन गणपति की पूजा दोपहर के समय करना शुभ माना जाता है, क्योंकि मान्यता है कि भाद्रपद महीने के शुक्लपक्ष की चतुर्थी को मध्याह्न के समय गणेश जी का जन्म हुआ था। गणेश चतुर्थी पर मध्याह्न काल में अभिजित मुहूर्त के संयोग पर गणेश भगवान की मूर्ति की स्थापना करना शुभ रहेगा। पंचांग के अनुसार अभिजित मुहूर्त सुबह लगभग 11.55 से दोपहर 12.40 तक रहेगा।

धनतेरस - दीपावली पूजा मुहूर्त


दीपावली धन, धान्य, सुख, समृद्धि और शांति पांच दिनों का त्यौहार धनतेरस से लेकर भाई दूज तक होता है। जिस की शुरुआत कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को धनतेरस (भगवान धन्वंतरी )के दिन से होती है। जिस के अगले दिन कार्तिक कृष्ण चतुर्दर्शी को नरक चतुर्दर्शी, अगले दिन कार्तिक अमावस्या को दीपावली (लक्ष्मी पूजा, गणेश पूजा, सरस्वती पूजा ), कार्तिक शुकल प्रतिपदा को कार्तिका शुद्धपद्यमी (गोवर्धन पूजा ) और पाचवा अंतिम दिन यमदिवितिया (भाई दुज ) होते है।  
धनतेरस पूजा मुहूर्त  = 18:05 से 20:01
समय अवधि   = 1 घंटा 55 मिंट
प्रदोष  काल  = 17:29 से 20:07
वृष  काल  = 18:05 से 20:00
 वैदिक ज्योतिष में 24 घंटो में 12 लगन होते है।  जिन की प्रकृति चर, स्थिर और द्विस्वभाव होती है।  स्थिर लगन में लक्ष्मी ,गणेश, सरस्वती जी की पूजा को शुभ माना जाता है। स्थिर लगन में पूजा करने से लक्ष्मी जी घर में टिकती  और आशीर्वाद  देती है।  

वृष्चिक लगन ( 8 ) सवामी मंगल : - मंदिरो , हॉस्पिटल्स , होटल्स , विद्यालय ,कलाकार, राजनीती, इन्शुरन्स में काम करने वाले लोग इस लगन में पूजा कर सकते है।  मंगल ग्रह हर क्षेत्र  में शारीरिक शक्ति ऊर्जा और क्षमता स्रोत है।   
कुम्भ लगन ( 11 ) सवामी शनि :-शनि के बुरे प्रभाव से छुटकारा पाने के लिए ,व्यापार में हानि वाले, रोगी, और  कर्ज में डूबे लोग इस लगन में पूजा कर सकते है। शनि की मूलत्रिकोण राशि कुम्भ है इस लिए इस लग्न में पूजा करने से शनि के अशुभ प्रभाव को काम किया जा सकता है।    
वृष लगन ( 2 ) सवामी शुक्र :- परिवार में रहने वाले लोग, विवाहित, बालक , मध्य वर्ग, निम्न वर्ग, ग्रामीण लोग , किसान, सभी प्रकार के व्यवसायियों  और वेतनभोगी लोगों के लिये इस लगन में लक्ष्मी ,गणेश, सरस्वती जी की पूजा करनी शुभ फलदायक होती है।  चन्द्रमा की उच्च और मूलत्रिकोण राशि वृष है
सिंह लगन ( 5 ) स्वामी सूर्य -तपस्वी, जोगी, संतों और तांत्रिक समुदाय के लोग इस लगन में पूजा करते है।  सिंह राशि सूर्य की मूलत्रिकोण राशि है। सूर्य अधिकार और मजबूत नेतृत्व का स्रोत है।
सभी लोगो को संध्या समय बृष लग्न में 17:57 से 19:52 के समय में पूजा करनी शुभ रहेगी।  क्योंकि बृष राशि चंद्रमा की उच्च और मूलत्रिकोण राशि है।  जिस का स्वामी शुक्र है और शुक्र का देवता लक्ष्मी जी है। जिन की पूजा करने से  हमें  धन, भाग्य, सुख समृद्धि मिलेगी।

लक्ष्मी जी,गणेश जी की पूजा के लिये 07 नवंबर 2018 को स्थिर लगन का समय, प्रदोष काल का समय और चौघड़िया का शुभ मुहूर्त
                       लगन                                  समय
                          वृष्चिक (8)                        प्रातकाल  - 07:24 से 09:42
                          कुम्भ (11)                         दोपहर   -13:29 से 14:57
                          वृष (2)                            संध्या काल - 17:57 से 19:52
                          सिंह (5)                           रात्रि काल  - 24:27+ से 26:45+

                        प्रदोष काल :-                               17:27 से 20:06
                       महानिषिता काल:-                  23:38 से 24:31 +
अमावस्या तिथि की शुरुआत:-   06 नवंबर 2018  को  22:27  से ले कर 07 नवंबर 2018 को 21:31 तक है।

पूजा के लिये शुभ चौघड़िया मुहूर्त :-  लाभ, अमृत, शुभ, चर 
 लाभ :- 06:41 से 08:02                                      लाभ :- 16:07 से 17:28                                                                                        
अमृत:- 08:02 से 09:23                                      शुभ :- 19:07 से 20:46                                                                                  
 शुभ :-  10:44 से 12:05                                      अमृत :- 20:46 से 22:26                                                                                 
चर :-  14:46 से 16:07                                      चर :- 22:26 से 24:05+


आश्विन शारदीय नवरात्र


आश्विन मास की नवरात्री शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से नवमी तक व्रत रख कर माँ को प्रसन किया जाता हैं। शारदीय नवरात्रे 9 दिन तक चलेगे। 10 अक्टूबर 2018 दिन बुधवार कलश की स्थापना के बाद माँ के प्रथम रूप शैलपुत्री की पूजा होगी। नौ दिनों तक चलने वाले इस महापर्व को मां भगवती के नौ रूपों क्रमशः शैलपुत्री, ब्रहमचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धदात्री देवी की पूजा की जाती है।
नवरात्र पर्व की प्रतिपदा के दिन स्नानादि करके ईष्ट देव की पूजा करने के बाद कलश की स्थापना करनी चाहिए। इसके बाद कलश में आम के पते व् पानी डाले। कलश पर पानी वाले नारियल को लाल कपडे से या लाल मोली से बांध कर रखे। उसमे एक बादाम ,दो सुपारी ,एक सिका जरूर डाले। इसके बाद जोत व् धुप बत्ती  जला कर माँ सरस्वती,माँ लक्ष्मी,माँ दुर्गा और उनके सभी रूपो की पूजा करे तथा दुर्गा सप्तशती का पाठ करें। नवरात्रों के ख़तम होने पर घर में कलश के जल का छिड़काव करे और चना, हलवा, खीर आदि से भोग लगाकर कन्या पूजन करे।  
प्रतिपदा  तिथि  की शुरुआत 9 अक्टूबर 2018 समय  09:16 से 10 अक्टूबर 2018 समय 07:25 तक
क्लश स्थापना का शुभ समय
प्रातः 06 बजकर 22 मिनट से 07 बजकर 25 मिनट तक
महूर्त की अवधि - 1 घंटा 02मिन्ट 

जन्माष्टमी पूजन और व्रत


जन्माष्टमी का त्योहार भगवान श्री कृष्ण जी के जन्मोत्सव के रूप मे पूरे भारत मे बहुत उत्साह के साथ मनाया जाता है। इस वर्ष 2 सितम्बर 2018 रविवार को सप्तमी तिथि रात्रि 20:47 मिंट तक व्याप्त है। उसके उपरांत 20:47 मिंट से अर्धरात्रि चंद्रोदय व्यापनी और 20:49 मिंट पर रोहिणी योग और बृष के चन्द्रमा का योग भी है। इस लिए 2 सितम्बर की रात्रि सभी के लिए पूजन, व्रत, झूला झुलाना और चन्द्रमा को अर्ध देना प्रशस्त होगा। क्योकि 3 सितम्बर 2018 सोमवार को अष्टमी तिथि रात्रि 19:20 मिंट तक और रोहिणी योग 20:06 तक ही व्याप्त है। उसके बाद तिथि नवमी और नक्षत्र मृगशिरा होगा। वर्षो की परम्परा अनुसार भगवान श्री कृष्ण जी के जन्म स्थान मथुरा-वृन्दावन में सूर्य उदयकालिक जन्मोत्सव मनाने की परम्परा है। उत्तर भारत के सभी प्रांतो में अर्धरात्रि और चंद्रोदय-व्यापनी जन्माष्टमी में व्रतादि करने की परम्परा है। जन्माष्टमी मनाने के बाद दही हांड़ी का उत्सव भी मनाया जाता है।

रक्षा बंधन का मुहूर्त



हिन्दू पंचांग के अनुसार सावन महीने की पूर्णिमा को भाई-बहन के प्रेम का प्रतीक त्योहार रक्षा बंधन इस वर्ष 26 अगस्त 2018 दिन रविवार को मनाया जायेगा। इस वर्ष रक्षा बंधन भद्रा से मुक्त होगा कियोकि भद्रा सूर्योदय से पहले ही समापत हो जाएगी। सावन महीने की पूर्णिमा तिथि 25 अगस्त शनिवार शाम को 15 :16 पर प्रारम्भ होगी और 26 अगस्त शाम 17 :25 पर समापत होगी।
राखी बांधने का मुहूर्त सुबह 05 :59 से ले कर शाम 15 :25 तक,11 घंटे 26 मिंट का होगा।
अपराह्न समय का महूर्त 13 :39 से 16 :12 तक, 02 घंटे 33 मिंट का होगा।  

दीपावली लक्ष्मी पूजा मुहूर्त



दीपावली प्रकाश का त्यौहार है। दीपावली का अर्थ होता है - दीपों की माला। हिंदू मान्यताओं में इस दिन भगवान् राम अपनी पत्नी सीता और अपने भाई लक्ष्मण के साथ 14 वर्ष का वनवास बिताकर अयोध्या लौटे थे। उनके स्वागत के लिए  अयोध्यावासियों ने दिये जलाकर उनका स्वागत किया था। इसी कारण इसे प्रकाश के त्यौहार के रूप में मनाते हैं।।
दीपावली पर्व कार्तिक कृष्ण अमावस्या 19 अक्तूबर 2017 दिन गुरुवार प्रदोष काल से लेकर अर्धरात्रि तक लक्ष्मी पूजा करने का विशेष महत्त्व होता है। दीपावली पर तन्त्रिक पूजा के लिए महानिषिता काल सबसे अच्छा माना जाता है।
पूजा के लिए संध्या समय बृष स्थिर लग्न में 19 :09 से 21 :03 के समय में पूजा करनी शुभ रहेगी। क्योंकि बृष राशि चंद्रमा की उच्च और मूलत्रिकोण राशि है  जिस का स्वामी शुक्र है और शुक्र का देवता लक्ष्मी जी है.जिन की पूजा करने से हमें धन,भाग्य,सुख समृद्धि मिलेगी
प्रदोष काल और महानिषिता काल का समय और चौघड़िया का शुभ मुहूर्त !
प्रदोष काल :-  17:43 से 20:17
महानिषिता काल:-  23:42  से 24:33 +
अमावस्या तिथि की शुरुआत:- 19 अक्टूबर 2017 : प्रातकाल 00:13  से ले कर 20 अक्टूबर 2017 : प्रातकाल 00:41 तक है
पूजा के लिये शुभ चौघड़िया मुहूर्त :-  शुभ, चर, लाभ, अमृत 
सुबह :- शुभ :- 06:32 से 07:56 ,  चर, लाभ, अमृत :- 10:44 से 14:55 , शुभ :-  16:19 से 17:43
सांयकाल :- अमृत, चर :- 17:43 से 20:56 ,लाभ :- 24:08+ से 25:44+                    

धनतेरस पूजा मुहूर्त


हिन्दू पंचांग के अनुसार कार्तिक मास की त्रयोदशी तिथि को मनाए जाने वाले इस महापर्व धनतेरस को सुख-समृद्धि, धन, यश और वैभव का त्योहार माना जाता है। इसी दिन भगवान विष्णु देवताओं को अमर करने के लिए वैद्य धन्वंतरि के रूप में अमृत कलश सहित सागर मंथन से प्रकट हुए थे। जिस के कारण इस दिन धनतेरस के साथ-साथ धन्वंतरि जयंती भी मनाई जाती है। इस दिन धन के देवता कुबेर और आयुर्वेद के देव धन्वंतरि जी की पूजा की जाती है। धन्वंतरि चिकित्सा के देवता भी हैं इसलिए उनसे अच्छे स्वास्थ्य की कामना भी की जाती है। धनतेरस के दिन  अच्छी-अच्छी वस्तुएं, चांदी के बर्तन, नए बर्तन,पीतल के बर्तन या सोना-चांदी खरीदने की परंपरा है। धनतेरस पर सायंकाल को दीपक जलाकर धन और वैभव की देवी मां लक्ष्मी का आवाहन किया जाता है। इस दिन को यमदीप दान भी कहा जाता है।
लक्ष्मी पूजा प्रदोष काल के दौरान किया जाना चाहिए जो सूर्यास्त के बाद शुरू होता है और लगभग 2 घंटे और 24 मिनट तक रहता है।
धनतेरस तिथि : 17 अक्तूबर 2017, मंगलवार
धनतेरस पूजन मुर्हुत : 19:19  से 20:17 तक
प्रदोष काल :  17:45 से रात्रि 20:17 तक
वृष काल : 19:19 से रात्रि 21:14 तक

त्रयोदशी तिथि प्रारंभ 17 अक्तूबर 2017 : प्रातकाल 00:26 से ले कर 18 अक्तूबर 2017 प्रातकाल 00:08 तक है 

चैत्र नवरात्र और पूजा मुहूर्त


हिन्दू कैलेंडर के अनुसार चैत्र प्रतिपदा के दिन हिन्दू नववर्ष विक्रमी संवत्सर की शुरुआत होती है और प्रतिपदा से आरंभ हो कर नवमी तक मां दुर्गा के नौ रूपों की पूजा-अर्चना और उपवास का विधान है। माँ नवदुर्गा की कृपा पाने के लिए नवरात्रो के नौ दिन बहुत खास महत्व रखते हैं। इस वर्ष चैत्र नवरात्रो का पर्व 28 मार्च 2017 से ले कर 5 अप्रैल 2017 मनाया जायेगा। ज्योतिष द्रिष्टि से सूर्य 12 राशियो का भ्रमण पूरा करने के बाद फिर से प्रथम राशि मेष में प्रवेश करता है और ग्रीष्म ऋतू की शुरुआत हो जाती है।
प्रतिपदा तिथि क्षय होने के कारण घटस्थापना महूर्त अमावस्या तिथि के दिन निर्धारित किया गया है प्रतिपदा तिथि प्रारम्भ 28 मार्च 2017 को 08 :26 और प्रतिपदा तिथि समापत 29 मार्च 2017 को 05 :44 पर

घटस्थापना का मुहूर्त सुबह 8:26 से लेकर 10:24 तक

शुभ चौघड़िया मुहूर्त घटस्थापना के लिए :-
चर - 09 :23 से 10 :55
लाभ -10 :55 से 12 :26
अमृत -12 :26 से 13 :58
अभिजीत मुहूर्त :-12:01 से 12:50

पहला नवरात्र 28 मार्च प्रथमा तिथि दिन मंगलवार :- पूजन माँ शैलपुत्री
दूसरा नवरात्र 29 मार्च द्वितीया तिथि  दिन बुधवार :- पूजन माँ ब्रह्मचारणी
तीसरा नवरात्र 30 मार्च तृतीया तिथि दिन बृहस्पतिवार :- पूजन माँ चंद्रघंटा
चौथा नवरात्र 31 मार्च चतुर्थी तिथि दिन शुक्रवार :- पूजन माँ कुष्मांडा
पांचवा नवरात्र 01 अप्रैल पंचमी तिथि दिन शनिवार :- पूजन माँ स्कंदमाता
छठा नवरात्र 02 अप्रैल षष्टी तिथि दिन रविवार :- पूजन माँ कात्ययानी
सातवा नवरात्र 03 अप्रैल सप्तमी तिथि दिन सोमवार :- पूजन माँ कालरात्रि
आठवा नवरात्र 04 अप्रैल अष्ठमी तिथि दिन मंगलवार :- पूजन माँ महागौरी
नवम नवरात्र 05 अप्रैल नवमी तिथि दिन बुधवार :- पूजन माँ सिद्धिदात्री राम नवमी


Makar Sankranti


This festival is celebrated based on the solar year. As per Vedic astrology, Sun transits from Saggitarius to capricorn sign on the zodiac. Sun changes its position from  Dakshinayan (South) to Uttarayan ( North). Makar Sankranti is also known to be the festival of Sankraman kaal of the Sun. Sun transits through 12 signs of the Zodiac in one year. Sankranti is once in a month when sun moves from one Zodiac sign to other. Makar Sankranti is celebrated once in year. Sun will move into Capricorn sign of the Zodiac on the 14th of January, hence it is called Makar Sankranti.  Dakshinayan (South) and Uttarayan (North) are both of 6 months each. Uttarayan is believed to be the day of the Gods and Dakshinayan is believed to be the night. In Mahabharata, Bhisham Pitama waited for the Sun’s Uttarayan while laying on his death bed.  People wake up early on this day and bathe in rivers and lakes. People also worship the Sun and offer water to the Sun lord. On Makar Sankranti,  Puja is done in religious places and food is offered in the form of “Langar” to the masses.  People eat Khitchdi, Kheer and food made from “Till”. At many places, utensils made from earth  are covered in turmeric and wheat, Turmeric, cotton, sugarcane and coins are kept in them.  People also fly kites during Makar Sankranti and tournaments are organized at many places. In eastern India Makar Sankranti, is known as Bhogali Bihu. In southern India it is known as Pongal. In western India it is known as Uttaayana and in Northern India It is known as Maaghi.

धनतेरस पूजन मुर्हुत


धनतेरस दीपावली से दो दिन पहले बड़े ही धूमधाम से मनाई जाती है। हिन्दू पंचांग के अनुसार कार्तिक मास की त्रयोदशी तिथि को मनाए जाने वाले इस महापर्व धनतेरस को सुख-समृद्धि, धन, यश और वैभव का त्योहार माना जाता है। इसी दिन भगवान विष्णु देवताओं को अमर करने के लिए वैद्य धन्वंतरि के रूप में अमृत कलश सहित सागर मंथन से प्रकट हुए थे जिस के कारण इस दिन धनतेरस के साथ-साथ धन्वंतरि जयंती भी मनाई जाती है। इस दिन धन के देवता कुबेर और आयुर्वेद के देव धन्वंतरि जी की पूजा की जाती है। धन्वंतरि चिकित्सा के देवता भी हैं इसलिए उनसे अच्छे स्वास्थ्य की कामना भी की जाती है। धनतेरस के दिन  अच्छी-अच्छी वस्तुएं, चांदी के बर्तन, नए बर्तन,पीतल के बर्तन या सोना-चांदी खरीदने की परंपरा है। धनतेरस पर सायंकाल को दीपक जलाकर धन और वैभव की देवी मां लक्ष्मी का आवाहन किया जाता है। इस दिन को यमदीप दान भी कहा जाता है।

धनतेरस तिथि : 28 अक्तूबर 2016, शुक्रवार
धनतेरस पूजन मुर्हुत : सायं 17:35  से 18:20 तक (स्थिर लगन के बिना)
प्रदोष काल : सायं 17:35 से रात्रि 20:11 तक
वृषभ काल : सायं 18:35 से रात्रि 20:30 तक
त्रयोदशी तिथि प्रारंभ : सायं 16:15 से, 27 अक्तूबर 2016

त्रयोदशी तिथि समाप्त : सायं 18:20 तक, 28 अक्तूबर 2016

Deepawali Lakshmi Puja Muhurat



Deepawali is one of the most famous festivals of India. Deepawali means "Festival of Lights". The festival is celebrated on the 13th lunar day of Krishna Paksha.  This festival is celebrated continuously for five days. It starts with the 1st day of Dhanteras (Bhagwan Dhanwantari), followed by the 2nd day of Narak charturdashi (Shotti Deepavali), the 3rd day of Deepawali (Lakshmi puja), the 4th day of Kartika Shuddha Padyami (Gowardhan puja) and ends with the 5th day of Yama Diwitiya (Bhai Dooj)
People of all religion enjoy this festival. People clean their homes and decorate with making rangoli, lighting lamps, candles and buy new cloths, pots or jewelry for their family. They exchange sweets, gifts between friends and relatives.  In the evening they go to Temples, Gurudwaras for puja- archana  and after puja they burn fire-crackers.
In Vedic astrology there are twelve Lagna signs in twenty-four hours and they are categorized as Movable, Fixed and Dual signs. Fixed lagna are considered shubh muhurat and are auspicious for Lakshmi Puja & Ganesh Puja. If  Puja is done during this fixed lagna then Lakshmi ji will stay in the home and give her blessings.
 The general public should perform Puja in Evening Time - 18:28 to 20:23 in Taurus lagna. The Lord of Taurus sign is Venus. The deity of Venus is Lakshmi ji and their vahan is owl. Lakshmi ji will stay in the home of the worshipper and give her blessings, wealth, fortune, prosperity, money, luxury because Taurus sign is exalted sign and mool trikon sign of Moon.  

Given below is the time of all fixed Lagna, Pradosh kaal for Deepawali Puja
Muhurat- 30 Oct 2016
            Lagna                                               Time
Scorpio    (8)                         Morning- 07:55 to 10:13
Aquarius  (11)                       Afternoon- 14:00 to 15:28
Taurus      (2)                        Evening- 18:28 to 20:23
Leo          (5)                         Mid Night- 24:58+ to 27:16+
Lakshmi Puja Muhurta = 18:28 to 20:09
Duration = 1 Hour 42 Mins
Pradosh Kaal = 17:33 to 20:09
Mahanishita Kaal = 23:38 to 24:31+
Amavasya Tithi Begins =  20:40 on 29 October 2016
Amavasya Tithi Ends =   23:08 on 30 October 2016
There are four Auspicious Chaoghadiya Puja Muhurat-Amrit, Shubh, Labh and Char
 Morning Muhurta (Char, Labh, Amrit) = 07:58 - 12:05
Afternoon Muhurta (Shubh) = 13:27 - 14:49
Evening Muhurta (Shubh, Amrit, Char) = 17:33 - 22:27



नवरात्री का त्योहार


हिन्दू धर्म की मान्यता के अनुसार माँ भगवती की शक्ति से धरती पर सभी प्रकार के कार्य सम्पन होते है। नवरात्री का त्योहार वर्ष में दो बार चैत्र मास में और आश्विन मास में आत्ता है। आश्विन मास के इन नवरात्रों को शारदीय नवरात्र  भी कहा जाता है। अश्विन शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से नवमी तक व्रत रख कर माँ को प्रसन किया जाता हैं। आमतौर पर शारदीय नवरात्रे 9 दिन के होते है लेकिन इस बार नवरात्रे 10 दिन तक चलेगे। 1अक्टूबर 2016 दिन शनिवार कलश की स्थापना के बाद माँ के प्रथम रूप शैलपुत्री की पूजा होगी। आश्विन मास की नवरात्री के दौरान ही भगवान राम जी की पूजा और रामलीला भी अहम होती है। नौ दिनों तक चलने वाले इस महापर्व को मां भगवती के नौ रूपों क्रमशः शैलपुत्री, ब्रहमचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धदात्री देवी की पूजा की जाती है।
नवरात्र पर्व की प्रतिपदा के दिन स्नानादि करके ईष्ट देव की पूजा करने के बाद कलश की स्थापना करनी चाहिए। इसके बाद कलश में आम के पते व् पानी डाले। कलश पर पानी वाले नारियल को लाल कपडे से या लाल मोली से बांध कर रखे। उसमे एक बादाम ,दो सुपारी ,एक सिका जरूर डाले। इसके बाद जोत व् धुप बत्ती  जला कर माँ सरस्वती,माँ लक्ष्मी,माँ दुर्गा और उनके सभी रूपो की पूजा करे तथा दुर्गा सप्तशती का पाठ करें। नवरात्रों के ख़तम होने पर घर में कलश के जल का छिड़काव करे और चना, हलवा, खीर आदि से भोग लगाकर कन्या पूजन करे।      

  

श्री कृष्ण जन्माष्टमी

                        


श्री कृष्ण जन्माष्टमी हिन्दू धर्म का पवित्र और प्रसिद्ध त्योहार है। जन्माष्टमी हिन्दू कैलेण्डर के अनुसार भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की आठवी तिथि को यह त्योहार मनाया जाता है। भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मध्यरात्रि रोहिणी नक्षत्र में देवकी व श्री वासुदेव के पुत्र रूप में श्री कृष्ण जी ने मथुरा में जन्म लिया था। इसे भगवान् श्री कृष्ण के जन्म दिन के रूप में मनाया जाता हैं। जन्माष्टमी को गोकुलाष्टमी के नाम से भी जाना जाता है। जन्माष्टमी महाराष्ट्र मे दही-हांडी के लिए विषेश प्रसिद्ध है। सम्पूर्ण भारत में जन्माष्टमी पर कृष्ण मंदिरों में समारोह किये जाते हैं। मथुरा और वृंदावन की जन्माष्टमी जहाँ भगवान् श्रीकृष्ण ने अपना बचपन बिताया था वहां की जन्माष्टमी दुनिया भर में प्रसिद्ध  है। जन्माष्टमी के दिन लोग उपवास रखते हैं तथा आधी रात में भगवान् श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव को मनाकर उपवास को फलाहार के द्वारा खोला जाता है। यह उपवास मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाला होता है। सभी मंदिरो में कीर्तन एवं भजनो का आयोजन किया जाता है।

इस वर्ष कृष्ण जन्माष्ठमी कई जगह 14 अगस्त को और कई जगह 15 अगस्त को मनाई जायेगी। 14 अगस्त को सप्तमी समापत हो कर अष्ठमी लग जायेगी। जो की 15 अगस्त 2017, 17:39 बजे तक रहेगी। 

अक्षय तृतीया पर्व

अक्षय तृतीया पर्व वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाता है। इस साल 9 मई 2016 को मनाया जायेगा।किसी भी कार्य को करने के लिये कोई शुभ मुहुर्त ना मिल रहा हो तो नई शुरुआत करने के लिये अक्षय तृतीया का दिन बेहद शुभ माना जाता है। गोचर में शुक्र अस्त होने के कारण विवाह कार्य नहीं हो सकते अक्षय तृतीया के दिन सोना खरीदना बहुत शुभ माना जाता है। इस दिन स्वर्ण आभूषणों की ख़रीद को भाग्य की व्रिधि से जोडा़ जाता है। इस दिन को सबसे पवित्र दिनों में से एक माना जाता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार त्रेता युग की शुरुआत भी इसी दिन से हुई थी। अक्षय तृतीया या आखा तीज भगवान परशुराम विष्णु के छठे अवतार का जन्मदिन है।'परशु' प्रतीक है पराक्रम का। 'राम' पर्याय है सत्य सनातन का। इस प्रकार परशुराम का अर्थ हुआ पराक्रम के कारक और सत्य के धारक।

वैसाखी त्यौहार


वैसाखी एक राषट्रीय त्यौहार है I इस वर्ष 13 अप्रैल 2016 को चैत्र मास के शुकल पक्ष की सप्तमी तिथि चन्द्रमा मिथुन राशि में और नक्षत्र आर्द्रा में और सूर्य मेष राशि में प्रवेश करता है तब मनाया जाता हैI मेष संक्रांति के कारण इस दिन मेले लगते हैI सिखों के दसवें गुरु गोबिंद सिंह जी ने वैसाखी के दिन ही आनंदपुर साहिब में वर्ष 1699 में खालसा पंथ की नींव रखी थीI खेतों में गेहू की फसल पक जाती है और किसान ख़ुशी में नाचते गाते है और वैसाखी का त्यौहार मनाते है 

सूर्य का मेष राशि में प्रवेश के समय तुला लगन चर राशि की कुंडली बनीI जिस में लगनेश और वर्ष का राजा शुक्र षष्ट भाव में स्थित हैI इस की नीच द्रिष्टि व्यय भाव पर हैI सूर्य की सप्तम भाव में बुध के साथ युक्ति और लगन पर पूर्ण द्रिष्टि हैI शनि की शत्रु राशि में बक्री स्थिति, मंगल और शनि की धनु भाव में युक्ति होनाI लाभ भाव में गुरु चण्डाल योग और गुरु शनि के मध्य 4/10 का सम्बन्द होनाI ग्रहों के योग से अग्नि कांड,दुर्घटनाओं, आंतकी हमले,भूकम्प,आर्थिक मंदी, तेज हवाएं, बाढ़, कुदरती आपदा होने के योग हैI  
ग्रहों की स्थिति का मानव जीवन पर भी असर पड़ेगा हरेक व्यक्ति की कुंडली के जिस भाव में ग्रहों की युक्ति और स्थिति हैI उसी के हिसाब से व्यक्ति को अच्छे और बुरे परिणाम मिलेगेI 

                      

होली का त्योहार

         

होली का त्योहार रंगों का त्योहार हैI इस दिन लोग एक दूसरे पर गुलाल लगाते हैं और रंग फेंकते हैं और एक दूसरे को गले लगाते हैI बच्चों के लिए तो यह त्योहार विशेष महत्व रखता हैI फाल्गुन मास की पुर्णिमा को यह त्योहार मनाया जाता हैI होली के साथ अनेक कथाएं जुड़ीं हैंI होली मनाने के एक रात पहले होली को जलाया जाता हैI इसके पीछे एक लोकप्रिय इतिहासिक कथा हैI

होली के साथ एक इतिहासिक कथा भी जुड़ी हुई हैI प्रहलाद के पिता हरिण्यकश्यप एक राक्षस राजा था। खुद को भगवान कहता थाI उनके पुत्र प्रहलाद विष्णु भक्त थेI हरिण्यकश्यप ने प्रहलाद को विष्णु भक्ति करने से रोकाI प्रहलाद ने विष्णु की भक्ति बंद नहीं कीI हरिण्यकश्यप क्रोधित हो गया और प्रहलाद को कई तरह से सजा देने लगाI लेकिन प्रहलाद को भगवान की कृपा से कुछ भी नहीं हुआI हरिण्यकश्यप ने प्रहलाद को मार डालने के लिए अपनी बहन होलिका से मदद मांगीI होलिका को आग में न जलने का वरदान प्राप्त थाI होलिका अपने भाई की सहायता करने के लिए तैयार हो गईI होलिका के पास एक ऐसी चादर थीI जिसे ओढ़ने पर व्यक्ति आग के प्रभाव से बच सकता थाI होलिका ने उस चादर को ओढ़कर प्रहलाद को गोद में ले लिया और चिता पर जा बैठीI तब दैवीय चमत्कार हुआI चादर उड़ कर प्रहलाद के ऊपर गिर पडीI विष्णु जी की कृपा से प्रहलाद सुरक्षित रहे और होलिका जल कर भस्म हो गईI परंतु विष्णु भक्त प्रहलाद का बाल भी बाँका न हुआI भक्त की विजय हुई और राक्षस की पराजयI उस दिन बुराई पर अच्छाई की जीत हुईI तब से लेकर आज तक होली का पर्व मनाया जाता हैI

Maha Shivaratri Festival in Guru Chandaal Yog after 35 years

Maha Shivaratri is a famous Hindu festival. Usually Shivaratri is observed on the night of  Phalgun month Krishna Paksha Trodashi. As per convenience, this is observed every year during the  Chaturdarshi (Feb-March) in Krishna Paksha of  Phalgun month. On the day of Shivaratri, people worship Lord Shiva. Devotees pay respects to Lord Shiva by fasting and offering fruits, water and milk. This year this festival is on Monday, 7th March, 2016 in Dhanishtha Nakshatra and because the festival is on a Monday, it’s importance has increased as Monday is the day of Lord Shiva.

Position of Planets

The festival of Maha Shivaratri is usually celebrated when Venus is in its exalted sign Pisces. However, this time this is not the case, because this day Venus is in Capricorn. On the occasion of Maha Shivaratri this year, the conjunction of Jupiter and Rahu in Leo sign,is creating ChandaalYog. The previous Maha Shivaratri  in ChandaalYog in Leo sign occurred in 1980.

Pooja items for 12 Signs on Maha Shivaratri.


Aries – Offer Akk flower to Lord Shiva.
Taurus – Offer a mixture of milk and water to Lord Shiva.
Gemini – Offer Bale Pattar to Shivling.
Cancer – Offer Sandalwood  and Rice to Lord Shiva.
Leo –Light a lamp of pure ghee on the evening of Maha Shivaratri in Lord Shiva temple.
Virgo – Recite Shiva panch akshara stotra in Shiva Mandir.
Libra – Offer Mishri and Butter and pray to Lord Shiva.
Scorpio – Offer unboiled milk to Lord Shiva.
Sagittarius –Pray to Lord Shiva with Akk flower and Bale Pattar.
Capricorn – Offer white flower to Lord Shiva.
Aquarius –Offer Kesar milk to Shivling.
Pisces – Offer Rice and Sandalwood to Lord Shiva.